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मित्रो, मेरा नाम भगवान दास है, मैं 20 साल का हूँ. मैं एक साधारण परिवार का युवक हूँ, अपने परिवार के साथ कोलकाता के समीप एक लिमिटेड कम्पनी ...

मामी की चुदाई के बाद उनकी बेटी को चोदा-1


मित्रो, मेरा नाम भगवान दास है, मैं 20 साल का हूँ. मैं एक साधारण परिवार का युवक हूँ, अपने परिवार के साथ कोलकाता के समीप एक लिमिटेड कम्पनी की कॉलोनी में रहता हूं.

मामी की चुदाई की यह आप बीती मेरे जीवन की एक ऐसी घटना है, जिसे मैं कभी नहीं भूल सकता हूँ.
यह रियल सेक्स स्टोरी आज से 4 साल पहले एक दशहरे की है. मेरे चालीस साल के मामा अपनी 36 साल की पत्नी और जवान बेटी अर्चना एवं दो बेटों के साथ नजदीक के एक किराए के फ्लैट में रहते हैं.

षष्ठी की रात कोलकाता में दुर्गा पूजा का जबरदस्त उफान रहता है. सभी अपनी अपनी पूजा और घूमने आदि में बिजी रहते हैं. मेरे दोनों ममेरे भाई अपनी बहन के साथ कोलकाता का दशहरा घूमने गई थीं और मामा को अकस्मात रात की पाली को काम पर जाना था. मैं भी अपनी टोली के साथ दशहरा घूमने की सोच रहा था, तभी रात्रि 9 बजे मामा जी का फोन आया कि मामी घर में अकेली हैं और मुझे काम पर जाना है, तुम तुरंत घर पहुंच जाओ.

मेरी सारी खुशियां उड़न छू हो गईं, जैसे तैसे मित्रों से सॉरी बोला और मम्मी को बता कर मामा के घर आया तो मामा जी बाहर लॉन में काम पर जाने को तैयार मिले. मुझे देखा तो वे मामी के कमरे में रात में सोने की हिदायत देते हुए निकल गए.

मैं बुझे मन से मामी के घर के अन्दर गया तो पता लगा कि मेरे ममेरे तीनों भाई बहन कोलकाता पूजा घूमने गए हैं और अगली सुबह तक ही वापस आएंगे.

मैंने खाना मित्रों के साथ खा लिया था इसलिए डिनर के लिए मना करके सीधा मामी के रूम में लेटकर टी.वी. देखने लग गया. थोड़ी देर में मामी काम निपटा कर आईं, उनसे औपचारिक बातें हुईं, पर थकावट के कारण मुझे कुछ जबाब नहीं सूझ रहा था तो आँखें मूंद लीं. मुझे सोता देख, मामी प्यार से मेरे सिर पर हाथ फेरती फेरती मेरे बगल में सोने का उपक्रम करने लगीं.



उनका कोमल स्पर्श मुझे कुछ अजीब सा महसूस होने लगा और मेरी नींद जाती रही. मैं कोशिश करके भी नहीं सो सका. आज से पहले कई बार मामी के बेड पर एक साथ सोया था, परन्तु कभी ऐसा अजीब महसूस नहीं हुआ था. चढ़ती जवानी में मेरा लंड मामी के स्पर्श से सर उठाने लगा. लाख कोशिश करने पर भी लंड मामी की पेट में चुभने लगा. शर्म के मारे मेरी रात की नींद काफूर हो गई. नवम्बर की सर्दी में भी उनके साथ स्पर्श में मुझे पसीना आने लगा.

मामी को मेरे खड़े होते लंड का अहसास हो चुका था, जो उनके पेट में ठोकरें मार रहा था. मामी धीरे धीरे मुझे उकसाती हुई मेरे लंड से पेट सटा कर खेलती रहीं. अब अपने को रोक पाना मुझसे मुश्किल हो गया और मैं अनाड़ी की तरह इधर उधर हाथ मारने लगा.
अब मामी भी उत्तेजित होने लगीं और अचानक उन्होंने उठ कर अपनी लहंगा एवं चोली निकाल दी और पूरी नंगी हो गईं. मैंने भौचक्का सा उन्हें देख रहा था तभी अगले ही पल मामी मेरे नजदीक हुईं और मेरे एक एक कपड़े को निकाल कर मुझे भी नंगा कर दिया.

टयूबलाईट की रोशनी में मामी का नंगा बदन अंगारे की तरह दमक रहा था. उनकी साइज यही कोई 34-30-34 रही होगी. वे देखने में कतई तीन बच्चों वाली नहीं लगती थीं. उनकी शारीरिक बनावट भी कुछ अजीब और मस्त सी थी.

मैंने आज तक कभी नंगी औरत नहीं देखी थी. मेरी आंखें फटी रह गईं और बरबस ही मेरा कोमल हाथ उनकी गहरी नाभि में रेंगने लगा. मैं औरतों के मामले में तो बिल्कुल अनाड़ी था, पर मामी का संरमरमर सा बदन देखकर ऐसा लग रहा था, जैसे मेरे पास जूही चावला सोई हो. मामी की दो बड़ी-बड़ी मस्त और कठोर उन्नत चूचियों की ढलान सपाट पेट से होते हुए गहरी नाभि में समा गई और फिर कदली जैसी जांघों के बीच पाव रोटी जैसी फूली हुई मुलायम चुत देखकर मैं भी किसी स्वपन लोक में विचरण करता रहा.

जब मामी ने अपने मुँह में मेरा लंड लिया, तब मेरी तंद्रा टूटी. मुझे ऐसा लगा जैसे मेरा लंड फट जाएगा. मैं असहाय सा आहें भरता रहा. लंड चूसते चूसते शायद उनका पेट भर आया और डकार मारकर अचानक मामी ने पैंतरा बदला और मेरे लंड पर चुत टिका कर बैठ धीरे धीरे दबाव देने लगीं. मेरा कुंवारा लंड मामी की चुत में समाता चला गया.

मुझे ऐसा लगने लगा, जैसे किसी जलती आग में मेरा लंड चला गया हो. जड़ तक लंड जाते ही मामी चिहुंक उठीं और ताबड़तोड़ लंड की सवारी करने लगीं. हर चोट के साथ उनकी चीख निकल रही थी.
औरत का यह रौद्र रूप मुझे आज भी याद है. कामातुर मामी लंड पर खिलाड़ी की तरह कमरताल के साथ चुत पटकती रहीं. करीब बीस मिनट में उनका शरीर ऐंठने लगा और लंड पर थाप, गति की अपेक्षा तेज हो गई.
फिर एक जोरदार चीख के साथ मामी का लावा बह गया और इसके साथ ही उनकी उछल कूद मचाती दोनों चुचियां भी शांत हो गईं, जो अब तक उनकी कमर के हर उछाल के साथ हवा में लहराती रही थीं.

इधर अब भी मेरा लंड मामी की चुत से बाहर निकल कर सिंह गर्जना कर रहा था, यह देखकर मामी की खुशियां दोगुनी हो गईं और वे गांड मरवाने के लिए घोड़ी बन कर मुझे अपनी गांड में लंड डालने को इशारा करने लगीं.
मैंने मामी से कहा- मुझे नहीं आता है, अपने आप से कर लो.

तो उन्होंने चुदासी कुतिया बन कर अपनी गीली गांड में लंड का टोपा लगाकर मुझे धक्के मारने का इशारा किया. एक धक्के में ही मैंने अनाड़ी की तरह गोल गोल चूतड़ों के बीच उनकी कसी हुई गांड में अपना मूसल सा लंड जड़ तक ठोक दिया.

मामी दर्द के मारे बिलबिला उठीं और मामी की गांड से खून आने लगा. मुझे चुत से ज्यादा गांड में मजा आने लगा था.. इसलिए मैं धीरे धीरे उनके बताए अनुसार मामी की चुदाई करता रहा.
मेरा आनन्द हर सीमा को तोड़ गया और इसके साथ ही मैं हब्शी की तरह मामी की गांड को मारता रहा.
मामी हर कोण से चुदवाती रहीं और मैं अनाड़ी पूरी रात गुलाम की तरह उनकी चुत और गोरी गांड बजाता रहा.

अब मेरे शरीर में थोड़ी सी भी हिलने की ताकत नहीं रह गई थी, इसलिए दो बार चुत और तीन बार गांड मारकर हम एक दूसरे को पकड़े पता नहीं कब सो गए.

जवानी की शुरुआत में ही मामी की चुदाई के जीवन के इस अनमोल सुख को पा कर मैं धन्य हो गया. यह आलम ऐसा हो गया कि मैं विजय दशमी तक मामी के घर रुक गया था. दिन या रात जब भी मौका मिलता, रोज जबरदस्त चुदाई का दौर चलता.

मामा ब्रेकडाउन में व्यस्त एवं ममेरे भाई बहन घूमने में व्यस्त और मामी हमारे साथ चुदाई में मस्त रहीं. मामी को चोदते चोदते अहसास ही नहीं हुआ कि कब तीन दिन निकल गए.

पर एक दिन दोपहर लंच के बाद मामी को मेरा लंड चूसते हुए अचानक मामी की बेटी अर्चना ने हम लोगों को रंगे हाथ पकड़ लिया था. पहले मेरी नजर मामी की जवान बेटी पर पड़ी थी. अब मेरी हालत ऐसी कि काटो तो खून नहीं.

तुरन्त मामी के मुँह से लंड खींचकर अपनी पतलून की जिप लगाने की मैं नाकाम कोशिश करता रहा.

उधर अर्चना अपनी मम्मी पर बुरी तरह चीखती चिल्लाती रही. मैं मूक दर्शक बना मां बेटी की चिल्लम पों सुन कर भयभीत हो गया था. अर्चना की खुलेआम चुनौती मिली कि अब मैं ये करतूत घर में सभी को बताऊँगी.
मामी गिड़गिड़ा कर मिन्नतें करती करती हताश हो गईं, परन्तु अर्चना कुछ भी सुनने को तैयार नहीं थीं. हताशा में उन्होंने एक झटके में अर्चना को खींच कर बेड पर पटक दिया और मुझे उसकी जींस उतारने का इशारा किया.

मैं मामी की इस हरकत से एक बार सन्न हो गया था. परन्तु बिना समय गवाएं मैं अर्चना की जींस को उसकी टांगों से उतारने में कामयाब भी हो गया और वह जल बिन मछली की तरह तड़पती रही.
मामी ने अर्चना को काबू में करके, बिस्तर में दबा कर मुझे उसको नंगी कर उसकी बुर चाटने का हुक्म दाग दिया.

मरता क्या नहीं करता, मैं अपनी ममेरी बहन की काली पैन्टी निकाल आज्ञाकारी कुत्ते की तरह फटाफट बुर चाटने लगा. उसकी कुंवारी रोयेंदार बुर की महक से अब मेरा भय जाता रहा और मैं पूरी तन्मयता से उसकी छोटी सी बुर चाटने लगा.

मेरे होंठों का वार सहन नहीं कर सकी और मेरी बहन की बुर से मूत निकल गया.

अब उसका विरोध भी ढीला पड़ता गया और वो मुझे गन्दी गन्दी गालियां देते हुए आत्मसमर्पण कर गई.

आखिर अठारह साल की अकेली जान, कब तक हम दोनों का मुकाबला करती. मैं और भी जोश में उसकी बुर चूसने लगा. मक्खन सी बुर का कसैला नमकीन स्वाद पाकर लंड फिर से आकार लेने लगा था.

अब वह कमर उठा कर मेरे मुँह पर बुर मार रही थी, जिससे बार बार मेरे मुँह से बुर बाहर निकल जा रही थी. पर मैंने भी हार न मानी और बुर के अन्दर तक जीभ घुमा घुमाकर अर्चना की बुर को चूसता रहा.

मामी अर्चना के सिर पर हाथ फेरते हुए संतोष की सांस ले रही थीं. तभी अर्चना एक मार्मिक चीख के साथ अपना कामरस छोड़ने लगी और मैंने गरम और नमकीन पानी चाट कर उसकी बुर को साफ कर दिया.

अब मेरा मन उसकी मांसल जांघों और गुदाज चूतड़ों को देखकर चोदने को हो रहा था, परन्तु मामी ने मना कर दिया और मुझे अपने ऊपर खींच कर चोदने का इशारा किया.

अपनी इच्छा पूरी करने के लिए मैं कपड़े हटा कर मामी की चुत में मुँह लगा कर इस कदर से बुरी तरह चूसने चाटने लगा कि बस दो मिनट में ही मामी का लावा भलभला कर निकल गया. तभी मैंने अपना लंड मामी की चुत में डाल दिया. बीस मिनट तक पूरे जोर जोर से मामी को चोदता रहा और अर्चना मुझे देखकर मुस्कुराती रही. उसकी मुस्कुराहट में अपनी जीत महसूस कर रहा था इसलिए जब मेरा लंड पूरे उत्कर्ष पर था, तभी मैंने मामी की चुत से निकाल कर अर्चना के मुँह में अपना लंड डाल दिया.

वह लंड बाहर निकालने की कोशिश करती रही और मैं तुनक तुनक कर उसके कंठ में झड़ता रहा.

उसे कुछ स्वाद अच्छा सा लगा इसलिए उसने मेरा लंड चूस कर साफ कर दिया.

अब मामी ने कहा- अर्चना मैं एक नारी हूँ और नारी की भावना को समझते हुए मैंने तुम्हारा कामरस निकालने का कठोर निर्णय लिया. तुम अपनी मर्जी से कभी भी हमारे साथ शामिल हो सकती हो बशर्ते किसी को भनक तक नहीं लगे.

कुछ पल बाद खेल फिर शुरू हो गया, अब सामने अधनंगी अर्चना भी थी. इधर मैं अर्चना की कमसिन और स्वादिष्ट चुत चाट कर मन ही मन उसको चोदने की सोच रहा था और उधर मामी मुझे खींचकर दुबारा से अपनी चुत की आग ठंडी करने में लग गई थीं.

मामी की गोरी चुत चोदते हुए मेरी नजर अर्चना से मिली तो वो मुस्कुराने लगी और मुझे उसकी मुस्कुराहट से जान में जान आ गई. मैंने मामी की चुत से लंड निकाल कर अर्चना के मुँह में फिर से लंड का पानी झाड़ दिया.

अर्चना ने मेरे पूरे लंड को चचोर कर ऐसा चूसा, जैसे लगता था कि चबा जाएगी. धीरे धीरे मुझे भी सुख की अनुभूति होने लगी थी.

चूंकि मेरी कद काठी ठीक ठाक रही थी, इसलिए लंड कुछ देर बाद अपना आकार लेने लगा था, जिसे देखकर अर्चना बार बार प्रसन्न हो रही थी.

मैं मेरी जिन्दगी की दूसरी चुत की चुदाई करने का स्वर्ण अवसर खोना नहीं चाहता था इसलिए मैं उसके बचे हुए कपड़े एक एक करके निकालने लगा. उसके दूध जैसे उजले जिस्म का कटाव यही कोई 32-28-32 और हाईट पूरे 170 cms की थी. मामी से भी सुन्दर उसके उठे हुए मम्मों को तो देखते ही उसे चोदने का मन करने लगा था. उसके उन्नत मम्मों के ऊपर भूरे दाने, किसी पहाड़ की चोटी की तरह खड़े अपने फतह किए जाने का इंतजार कर रहे थे.

झील सी गहरी काली आंखों में तैरते लाल डोरे.. वासना का आमंत्रण देते लग रहे थे. गोल गोल कटोरे जैसे चूतड़ और चिकनी मोटी मोटी जांघें किसी भी मर्द से टकराने की माद्दा रखती दिख रही थीं. पावरोटी की तरह फूली बुर पर सुनहरे रोयें और उसके ठीक ऊपर गहरी नाभि किसी की भी नियत खराब करती इठला रही थी.
कुल मिलाकर अठारह साल की कचक जवान लड़की मेरे लंड से चुदने को बेकरार थी और मैं भी 167सेंटीमीटर हाईट और 62 किलो का गबरू जवान लड़का उसकी नथ उतारने के लिए उतावला था.
उधर मामी अपनी चुदी हुई चुत पर हाथ फेरती हम दोनों की कामक्रीड़ा का भरपूर आनन्द ले रही थीं.

हम दोनों जल्द ही 69 की पोजीशन में आ गए और एक दूसरे के गुप्तांगों को छेड़ कर उत्तेजित करने लगे. अभी अभी हम दोनों ही झड़े थे इसलिए मजा बहुत आ रहा था. मैंने अर्चना की अनचुदी बुर को चौड़ी करके जीभ से अन्दर का रस चाटता रहा. अर्चना के प्रीकम से मेरा मुँह लिसलिसा सा हो गया था.
तभी मामी ने खोद कर मुझे अपना लंड मेरी बहन की बुर में डालने का इशारा किया. मेरे 7 इंच लम्बे और 2 इंच मोटे लंड को बहन ने चूस चूस कर गहरा लाल कर दिया था.

बहन के सिर को मामी अपनी गोद में रखकर उसके दोनों मम्मों को सहलाने लगीं और मैंने मामी के बताए अनुसार थोड़ा फेश वाश लेकर बहन की बुर और अपने लंड पर लगा कर दोनों टांगों को ऊपर किया. दीदी की बुर फैला कर अपने लंड का टोपा सैट करके मामी से नजरें मिलाईं.

उन्होंने कहा कि जब तेरी बहन सांस अन्दर खींचे तो करारा चोट कर देना और अगर एक बार में नहीं डाल सके तो ये दूसरी बार तुझे चूत छूने भी नहीं देगी.

मैं अनाड़ी बुर को किसी भूखे भेड़िये की तरह निहारता हुआ तैयार था. अर्चना के सांस खींचते ही एक झन्नाटेदार धक्का दे मारा. मेरे लंड महाराज बहन की कुंवारी बुर की सील भंग करते हुए आधे से अधिक समा गए और इसी के साथ बहन एक हृदय विदारक चीख मार कर बेहोश हो गई.
मामी ने मुझे जस का तस रोक दिया और बहन के होश में आने तक उसके मुँह पर पानी के छींटे देती रहीं.

बहन की बुर से खून निकल रहा था और उसकी नंगी चुचियां सांस के साथ ऊपर नीचे हो रही थीं. अब धीरे धीरे मेरी ममेरी बहन होश में आने लगी और मेरी पकड़ से निकलने की बेकार कोशिश करने लगी.

समय की नजाकत को समझते हुए मामी ने मुझे धीरे धीरे चुदाई करने का इशारा किया. मैं छूटती हुई सवारी गाड़ी की तरह एक रफ्तार में चोदने लगा.

बहन थोड़ी देर में सामान्य हो गई और कमर उछाल उछाल कर अपनी बुर में ज्यादा लंड की मांग करने लगी. मुझे अपने लंड पर मामी की चुत से बहुत अधिक कसाव अनुभव हो रहा था. मुझे भी अब कुंवारी कन्या की बुर चोदने के असीम आनन्द की प्राप्ति होने लगी और मैं किसी मंजे हुए खिलाड़ी की तरह ताबड़तोड़ चोदते हुए बुर की धज्जियां उड़ाने लगा.

अर्चना आनन्द के उन्माद में एक हाथ में मामी के चुचे और दूसरे हाथ में तकिया भींच रही थी. करीब दस मिनट की भयंकर चुदाई के बाद दीदी दहाड़ मार मार कर झड़ने लगी और उसने मामी के एक चुचे को इतनी जोर से भींचा कि दीदी की दहाड़ के साथ मामी की भी चीख निकल गई.

मैं तीन दिनों के अनुभव को लेकर एक रफ्तार में चुदाई करता रहा और अर्चना को ऐंठ ऐंठ कर गरम कामरस छूटने को महसूस करता रहा था.

आज तक दर्जनों कुंवारी कन्याओं की बुर खोल चुका हूँ, पर ऐसा दुबारा कभी महसूस नहीं हुआ और मैंने भी चरम सुख भोगते हुए बहन की बुर में अपना लावा छोड़ दिया, जिसकी अनुभूति से अर्चना भी खिलखिला कर हंसने लगी, साथ में मामी भी हंसने लगीं.

दोनों मां बेटी की खुशी में मैं भी शरीक, खुश हो रहा था क्योंकि चार दिनों में मुझे दूसरी चुत चोदने को मिली थी.. वह भी सील पैक.

हम तीनों वहीं नंगे ही सो गए, करीब शाम पांच बजे मामी ने हम दोनों को जगाया. हम तीनों ने एक दूसरे के होंठों को चूम कर फ्रेश होने बाथरूम में नंगे समा गए. अर्चना दीवार पकड़ कर चल रही थी, मामी ने उसको सहारा देकर नहलाया और चुत में अन्दर तक उंगली डाल कर पानी के प्रेशर से साफ किया.
अर्चना की बुर की धारी फूल कर मोटी हो गई थी. परन्तु चेहरे पर अजीब लाली छा गई थी. अर्चना किसी खजुराहो की मूर्ति की तरह कामदेवी लग रही थी.

उसके बाद मामी और मैं एक दूसरे को साबुन लगाकर नहाने लगे. मेरा लंड साबुन लगे हाथ फेरने से पूरे आकार में हो गया तो मामी तुरन्त घोड़ी बन कर मेरे लंड को गांड में लेने को तैयार हो गईं.

मैं बिना किसी भूमिका के मामी की गंडासे जैसी धार दार गांड मारने लगा और अर्चना दीवार पकड़ कर खड़ी अवाक होकर ये गांड मराई का नजारा देखती रही. करीब आधे घंटे तक बाथरूम में सुनामी के बाद मैं मामी की चिकनी गोरी गांड में ही झड़ गया. इतनी ही देर में मामी दो बार झड़ गई थीं, ये उन्होंने बाद में बताया.

अब हम तीनों सुकून से अपने कपड़े पहन कर चाय की चुस्की ले रहे थे कि इतने में मामा जी थकी सी सूरत लेकर आ गए.

रात डिनर लेने के बाद मामा मामी अपने कमरे में और मैं बहन के कमरे में सोने आ गया. आज भी दोनों ममेरे भाई रात में घर नहीं आऐंगे, ऐसा बोल कर अपने मित्रों के साथ घूमने चले गए थे.

सारा दिन चुदाई के चलते हम दोनों की नींद कब लगी, नहीं मालूम. गहरी रात में मेरी नींद खुली तो मैं अर्चना के कसे हुए मम्मों को निहारने लगा और अगले ही अपना हाथ उसके मम्मों पर रख दिया. आअह्ह्ह.. दोस्तों क्या बताऊँ.. एकदम मखमल की तरह लग रहा था. थोड़ी देर तक ऐसे ही हाथ रखे रहा और कुछ देर बाद जब बहन की तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई.. तो मेरा मन अब कुछ और करने का होने लगा.

मैं धीरे से उसकी एक चूची को दबाने लगा. कुछ देर बाद मैं चूचियों को कपड़े के अन्दर से महसूस करना चाह रहा था तो मैंने उसके कुरते के गले में धीरे से हाथ डाला ही था कि बहन ने करवट बदल ली. मैंने जल्दी से अपना हाथ वापिस खींचा और सोने का नाटक करने लगा.

लगभग 5 मिनट के बाद मैंने देखा कि बहन की गांड और मेरा लंड.. दोनों आमने सामने हैं. तभी मैंने सोचा कि चलो गांड को भी स्पर्श कर लिया जाए. तो मैं धीरे से अपना सिर उसके पैरों की तरफ करके लेट गया और उसकी गांड पर हाथ रख कर धीरे से सहलाने लगा, मेरा लंड फिर अपना आकार लेने लगा.

अब मन नहीं मान रहा था.. एक हाथ मैंने पैन्ट के अन्दर ही धीरे धीरे लौड़ा सहला रहा था और दूसरे हाथ को दीदी की लोअर के अन्दर फेरता रहा. उसकी चुत से पानी निकलने लगा.

अब मैंने देर करना उचित नहीं समझा इसलिए अपने और बहन के सारे कपड़े उतार दिए. धीरे धीरे सिर से लेकर पैर तक उलट पुलट कर चूमने लगा. बहन की नींद जाती रही. हम लोग 69 की मशहूर पोजीशन में एक दूसरे को चाट कर समाप्त करने की नाकाम कोशिश करते करते दोनों चरम सुख को प्राप्त हो गए.

अब अर्चना की बारी थी उसने मुझे सर से पैर तक चाट कर उत्तेजित किया और मेरे लंड पर बजाज आलमंड आयल से मालिश की. मुझे बहन की चुत के अलावा कुछ भी नजर नहीं आ रही थी इसलिए चुत के मुँह को चौड़ा कर, लंड के टोपे को टिकाकर दबाव बनाया ही था कि बहन ने मुँह से लम्बी सांस लेते हुए गांड उछाल दी और अपनी चुत में मेरा पूरा लंड गटक लिया.

फिर सूरज उगने तक चुदाई का मैराथन दौर चलता रहा.

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